Saturday, May 15, 2010

My Latest Hindi poem on 'Ghar'

यादों की बुनियाद

आखिर वो वक़्त आही गया जुदा होनेका
दो पल में फैसला करलिया बिखरनेका

मै अपनी ज़िंदगी में तो बढ़ता जा रहा हू
लेकिन साथ ही उन यादों को दफना रहा हू

मै पढ़ा, खेला, हँसा, रोया उन चार दीवारों में
वो आवाज़े अब्भी गूंजती है मेरे कानो में

कोशिष तो करता हू की मिटादू उन यादोको अपने दिलसे
लेकिन ये यादोंकी जड़े जुडी है उस मंजिल से

मुझे डर है इसकी रेखा पार करने का
क्या मुझे कभी मौका मिलेगा इस 'घर' में मेहेमान बनकर रेहेनेका...